Saturday, 26 September 2015

खतरनाक तरीके से बढ़ रहे हैं ऑटिज्म के मरीज

दिल्ली (ब्यूरो)। ऑटिज्म का कोई इलाज नहीं है। जीन में गड़बड़ी से होनेवाला यह रोग भारत में तेजी से फैल रहा है। देश में दस साल में इसके मरीजों की संख्या छह गुना बढ़ गई है। दुनिया में फिलहाल 1.36 लोग इस रोग के शिकार हैं। इस रोग का इलाज तो नहीं है लेकिन इसका पता चल जाए तो मां-बाप बच्चे को अच्छी जिंदगी दे सकते हैं। तारें जमीन पर फिल्म भी इसी रोग के कानसेप्ट पर बनी थी। यह ऐसा मस्तिष्क विकार है, जो बच्चे में बोलचाल, कल्पनाशीलता और सामाजिक व्यवहार को नुकसान पहुंचाता है। अमेरिका में किए गए सर्वे से पता चला है कि पिछले दो साल में इसके 20 फीसदी मरीज बढ़ गए हैं। जबकि हर 88 बच्चों में एक को यह रोग है। आम लोगों में इस बीमारी के प्रति जागरूकता का अभाव तो है ही, चिकित्सा विशेषज्ञों को भी इसकी ठीक-ठीक जानकारी नहीं है। जीवन भर विकलांगता से मुक्ति न देने वाली इस बीमारी का बच्चे में तीन साल तक पता ही नहीं चलता। लड़कियों के मुकाबले ऑटिज्म का खतरा लड़कों में चार से पांच गुना ज्यादा रहता है। एम्स प्रशासन ने बाल व किशोर मनोचिकित्सा क्लिनिक में ऑटिज्म के शिकार बच्चों के लिए शुक्रवार विशेष रूप से तय कर रखा है। मनोचिकित्सक डॉ. राजेश सागर कहते हैं कि सामान्यतया बच्चों को इलाज के लिए लाने वाली मां बस इतना बता पाती हैं कि उसमें कुछ असामान्य लक्षण दिख रहे हैं। इस बीमारी के शिकार बच्चे लोगों के बीच रहना पसंद नहीं करते क्योंकि उनमें अपनी बात कहने की क्षमता नहीं होती है। कोख में पल रहे बच्चों के मस्तिष्क विकास के समय 32 सेल मिलकर एक ब्रेन सेल का निर्माण करता है। गर्भावस्था के दौरान मां के किसी गंभीर बीमारी का शिकार होने पर यह सेल नहीं बन पाते हैं। इससे बच्चा ऑटिज्म का शिकार हो जाता है अगर बच्चा छह महीने का होने पर भी न किलकारी भरे। नौ महीने में भी न मुस्कराए। साल भर की उम्र में भी किसी बात पर प्रतिक्रिया न दे। सवा साल का होकर एक शब्द का उच्चारण न करे। ...और उदास रहे। किसी के भी पास चला जाए। इस हालत में डाक्टर से जरूर संपर्क करें। एक बात याद रखें कि ऑटिज्म का मतलब जिंदगी का अंत नहीं।

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