Thursday, 17 September 2015

ऑटिज्‍म जागरुकता दिवस

  • ऑटिज्‍म जागरुकता दिवस हर साल 2 अप्रैल के दिन मनाया जाता है। 
  • संयुक्‍त राष्‍ट्र महासभा ने 2007 में 2 अप्रैल के दिन की थी इसकी शुरूआत। 
  • ऑटिज्‍म मस्तिष्‍क के विकास में बाधा डालने वाला विकार होता है। 
  • लडकियों के मुकाबले लडकों को ऑटिज्‍म होने की अधिक संभावना होती है। 
दुनिया भर में विश्‍व स्‍वपरायणता अर्थात ऑटिज्‍म जागरुकता दिवस 2 अप्रैल को मनाया जाता है।  संयुक्‍त राष्‍ट्र महासभा ने वर्ष 2007 में दो अप्रैल के दिन को विश्‍व ऑटिज्‍म जागरुकता दिवस घोषित किया था। इस दिन उन बच्‍चों और बडों के जीवन में सुधार के कदम उठाए जाते हैं, जो ऑटिज्‍म से पीडित होते हैं और साथ ही उन्‍हें इस समस्‍या के साथ सार्थक जीवन बिताने में सहायता दी जाती है। नीला रंग ऑटिज्‍म का प्रतीक माना गया है। भारत के सामाजिक न्‍याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के अनुसार 110 में से एक बच्‍चे ऑटिज्‍म का शिकार होता है और हर वर्ष 70 बच्‍चों में से एक इस बीमारी से प्रभावित होता है। 

चलिए इसके बारे में आज विस्‍तार से जानें -

क्‍या है ऑटिज्‍म 

ऑटिज्‍म को कई नामों से जाना जाता है जैसे स्‍वलीनता, मानसिक रोग, स्‍व परायणता । हर साल 2 अप्रैल को ऑटिज्‍म जागरुकता दिवस मनाया जाता है लेकिन सवाल यह उठता है कि ऑटिज्‍म है क्‍या। दरअसल ऑटिज्‍म मस्तिष्‍क के विकास में बाधा डालने और विकास के दौरान होने वाला विकार है। ऑटिज्‍म से ग्रसित व्‍यक्ति बाहरी दुनिया से अनजान अपनी ही दुनिया में खोया रहता है। क्‍या आप जानत हैं कि व्‍यक्ति के विकास संंबंधी समस्‍याओं में ऑटिज्‍म तीसरे स्‍थान पर है यानि व्‍यक्ति के विकास में बाधा पहुंचाने वाले मुख्‍य कारणों में ऑटिज्‍म भी जिम्‍मेवार है। आइए जानें ऑटिज्‍म संबंधी कुछ और बातें -

ऑटिज्‍म के लक्षण 

  • ऑटिज्‍म के दौरान व्‍यक्ति को कई समस्‍याएं हो सकती हैं, यहां तक कि व्‍यक्ति मानसिक रूप से विकलांग भी हो सकता है । 
  • ऑटिज्‍म के रोगी को मिर्गी के दौरे भी पड सकते हैं। 
  • कई बार ऑटिज्‍म से ग्रसित व्‍यक्ति को बोलने और सुनने में समस्‍याएं आती हैं। 
  • ऑटिज्‍म जब गंभीर रूप से होता है तो इसे ऑटिस्टिक डिसऑर्डर के नाम से जाना जाता है लेकिन जब ऑटिज्‍म के लक्षण कम प्रभावी होते हैं तो इसे ऑटिज्‍म स्‍पेक्‍ट्रम डिस्‍ऑर्डर (ASD) के नाम से जाना जाता है। एएसडी के भीतर एस्‍पर्जर सिंड्रोम शामिल है। 
ऑटिज्‍म का प्रभाव
  • आॅटिज्‍म पूरी दुनिया में फैला हुआ है। क्‍या आप जानते हैं कि वर्ष 2010 तक विश्‍व में तकरीबन 7 करोड लोग ऑटिज्‍म से प्रभावित थे। 
  • इतना ही नहीं दुनियाभर में ऑटिज्‍म प्रभावित रोगियों की संख्‍या मधुमेह, कैंसर एवं एडस के रोगियों की संख्‍या से मिलाकर भी इससे ज्‍यादा है। 
  • ऑटिज्‍म प्रभावित रोगियों में डाउन सिंड्रोम की संख्‍या अपेक्षा से भी अधिक है। 
  • आप ऑटिज्‍म पीडितों की संख्‍या का इस बात से अंदाजा लगा सकते हैं कि दुनियाभर में प्रति दस हजार में से 20 व्‍यक्ति इस रोग से प्रभावित होते हैं। 
  • कई शोधों में यह बात भी सामने आई है कि ऑटिज्‍म महिलाओं के मुकाबले पुरूषो में अधिक देखने को मिला है। यानि 100 में से 80 फीसदी पुरूष इस बीमारी से प्रभावित हैं। 
बच्‍चों में ऑटिज्‍म की पहचान 

बच्‍चों में ऑटिज्‍म को बहुत अासानी से पहचाना जा सकता है। बच्‍चों में ऑटिज्‍म के कुछ लक्षण इस प्रकार हैं-

  • किसी दूसरे व्‍यक्ति की आंखों में आंखें डालकर बात करने से घबराते हैं।
  • अकेले रहना अधिक पसंद करते हैं, ऐसे में बच्‍चों के साथ ग्रुप में खेलना भी इन्‍हें पसंद नहीं होता। 
  • बात करते हुए अपने हाथों का इस्‍तेमाल नहीं करते या फिर अंगुलियों से किसी तरह को कोई संकेत नहीं करते। 
  • बदलाव इन्‍हें पसंद नहीं होता। रोजाना एक जैसा काम करने में इन्‍हें मजा आता है। 
  • यदि कोई बात सामान्‍य तरीके से समझाते हैं तो इस पर अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं देते। 
  • बार-बार एक ही तरह के खेल खेलना इन्‍हें पसंद होता है। 
  • बहुत अधिक बेचैन होना, बहुत अधिक निष्क्रिय होना या फिर बहुत अधिक सक्रिय होना। कोई भी काम एक्‍सट्रीम लेवल पर करते हैं। 
  • ये बहुत अधिक व्‍यवहार कुशल नहीं होते और बचपन में ही ऐसे बच्‍चों में ये लक्षण उभरने लगते हैं। बच्‍चों में ऑटिज्‍म  को पहचानने के लिए 3 साल की उम्र की काफी है। 
  • इन बच्‍चों का विकास सामान्‍य बच्‍चों की तरह ना होकर बहुत धीमा होता है। 
ऑटिज्‍म होने के कारण 

अभी तक शोधों में इस बात का पता नहीं चल पाया है कि ऑटिज्‍म होने का मुख्‍य कारण क्‍या है। यह कई कारणों से हो सकता है -
  • जन्‍म संबंधी दोष होना । 
  • बच्‍चे के जन्‍म से पहले और बाद में जरूरी टीके ना लगवाना । 
  • गर्भावस्‍था के दौरान मां को कोई गंभीर बीमारी होना ।
  • दिमाग की गतिविधियों में असामान्‍यता होना ।
  • दिमाग के रसायनों में असामान्‍यता होना । 
  • बच्‍चे का समय से पहले जन्‍म या बच्‍चे का गर्भ में ठीक से विकास ना होना । 
लडकियों के मुकाबले लडकों की इस बीमारी की चपेट में आने की ज्‍यादा संभावना होती है। इस बीमारी को पहचानने को कोई निश्चित तरीका नहीं है, हालांकि जल्‍दी इसका निदान हो जाने की स्थिति में सुधार लाने के लिए कुछ किया जा सकता है। यह बीमारी दुनिया भर में पाई जाती है और इसका गंभीर प्रभाव बच्‍चों, परिवारों, समुदाय और समाज सभी पर पडता है।

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