सुमंत्र चटर्जी दिमाग के एक टुकड़े को फ्राई कर रहे हैं या कम-से-कम दिखने में ऐसा ही लगता है. बंगलुरू में नेशनल काउंसिल ऑफ बायोलॉजिकल साइंसेज (एनसीबीएस) में न्यूरो बायोलॉजिस्ट सुमंत्र महीन-से-महीन सुई से मस्तिष्क के एक कतरे में करंट प्रवाहित कर रहे हैं.
इस मस्तिष्क को कृत्रिम रूप से जिंदा रखा गया है. करंट प्रवाहित होने की सनसनाहट साफ सुनाई देती है. लेकिन वे एक अलग आवाज सुनने की कोशिश कर रहे हैं. यह मस्तिष्क की दो कोशिकाओं के संवाद की विद्युतीय भाषा है. इन दो कोशिकाओं के बीच एक मीटर के 25 अरबवें हिस्से के बराबर दूरी है.
जैसे ही वोल्टेज बढ़ाई जाती है, उनके कंप्यूटर स्क्रीन पर उठती-गिरती तरंगों का ज्वार उमड़ पड़ता है. वे कहते हैं कि कोशिकाएं बहुत ज्यादा बात कर रही हैं. यह असली ऑटिस्टिक मस्तिष्क है.
वर्षों तक भारत को इस दिमागी बीमारी के प्रसार या इसके शिकार लोगों की सही संख्या का अंदाजा नहीं था. पूरी जानकारी के अभाव में डॉक्टर हमेशा इसे एक विदेशी बीमारी माना करते थे और भारत में इसके प्रसार पर शक रहा करता था. मुंबई में ऑटिज्म के शिकार बच्चों के लिए काम कर रहे एक गैर-सरकारी संगठन उम्मीद की संस्थापक डॉ. विभा कृष्णमूर्ति का कहना है, ‘‘यह सबसे गलत समझी गई और गलत पहचानी गई बीमारी है.’’
डॉक्टर अकसर इसे दिमागी गतिरोध या शीजोफ्रेनिया मानकर इलाज करते रहते हैं या माता-पिता को गलत पालन-पोषण के लिए दोषी ठहराते रहते हैं. एक नए सर्वेक्षण में यह भ्रम टूटा है और पहली बार भारत में ऑटिज्म से पीड़ित लोगों की सही संख्या बताई गई है.
लंबे समय तक यही सवाल उठता रहा कि ऑटिज्म का कारण क्या है? अब सवाल यह है कि क्या इन कारणों को खत्म किया जा सकता है? वैज्ञानिक मस्तिष्क की कोशिकाओं के आपस में ‘‘बात’’ करने के तरीकों को समझने की प्रक्रिया में जीन और अणुओं में ऑटिज्म तलाश रहे हैं.
पशुओं के मॉडल पर यह साबित हो चुका है कि प्रयोगशाला में दिमागी गतिविधि को सामान्य स्तर तक धीमा करने से कुछ किस्म के ऑटिज्म की दिशा को पलटा जा सकता है. दुनिया के इस अत्याधुनिक और उन्नत विज्ञान के क्षेत्र में अब भारत ने भी कदम रख दिया है. उन्होंने ऐसे कुछ भ्रम तोड़ दिए हैं.
भारत में पहली बार कराए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक देश में एक करोड़ से अधिक बच्चे ऑटिज्म के शिकार हैं. सर्वेक्षण करने वाले इंटरनेशनल क्लीनिकल एपिडेमिओलॉजी नेटवर्क ट्रस्ट (इनक्लेन) के कार्यकारी निदेशक डॉक्टर एन. के. अरोड़ा कहते हैं, ‘‘हमने भारत में 2 से 9 वर्ष की आयु के बीच के तकरीबन एक से डेढ़ प्रतिशत ऑटिस्टिक बच्चे देखे हैं.’’
इसका अर्थ यह है कि प्रत्येक 66 में से एक बच्चा इसका शिकार है. किसी प्रकार के राष्ट्रीय अध्ययन के अभाव में भारत में लंबे समय तक ऑटिज्म की अनुमानित दर 500 में से एक से लेकर डेढ़ सौ में से एक के बीच झूलती रही है. ताजा सर्वेक्षण अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), तिरुअनंतपुरम मेडिकल कॉलेज और स्टैनफोर्ड तथा पेनिसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर आंध्र प्रदेश, ओडिसा, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और गोवा के 4,000 परिवारों पर किया गया है.
एम्स में काम कर चुके बालरोग विशेषज्ञ डॉ. अरोड़ा कहते हैं, ‘‘ऑटिज्म पर तत्काल ध्यान देना बहुत जरूरी है.’’ इनक्लेन ने भारत में ऑटिज्म की गंभीरता का पता लगाने के लिए एक नया तरीका भी विकसित किया है. इस समय भारत में पश्चिम में तैयार किया गया ऑटिज्म डायग्नोस्टिक ऑब्जर्वेशन शेड्यूल अपनाया जा रहा है.
डॉ. अरोड़ा का कहना है, ‘‘ऐसे बच्चों की संख्या बेहद चौंकाने वाली है और उन्हें मुख्यधारा के समाज में लाने के लिए नीति बनाने और हस्तक्षेप करने की जरूरत है.’’
सुमंत्र चटर्जी कहते हैं, ‘‘मेट्रो स्टेशनों की मशहूर चेतावनी याद कीजिए- ‘प्लेटफॉर्म पर उतरते समय दूरी का ध्यान रखें’ मस्तिष्क में भी कई दूरियां हैं. असली चुनौती यह पता लगाने की है कि वहां होता क्या है.’’ एनसीबीएस की इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी प्रयोगशाला में शांति और स्थिरता हैः न घड़ी, न मोबाइल और न कोई हरकत.
पूरी प्रयोगशाला में तार, पाइप, नली और टेस्ट ट्यूब का जाल बिछा हुआ है. कहीं डिजिटल स्क्रीन टिमटिमा रही है, तो कहीं माइक्रोस्कोप जूम कर रहा है. शोधकर्ता मस्तिष्क के टुकड़ों को प्रत्येक घंटे पर उद्वेलित कर रहे हैं ताकि उसकी इलेक्ट्रिक गतिविधियों को रिकॉर्ड कर सकें. इस डाटा के आधार पर डॉ. चटर्जी को ऑटिस्टिक मस्तिष्क की संरचना को समझने में मदद मिलेगी. जैसे कंप्यूटर स्क्रीन पर ग्राफ चढ़ता-उतरता है, मस्तिष्क में मौजूद अरबों तंत्रिकाएं अंतरालों के बीच से आपस में बात करने लगती हैं.
पलक को एक बार झपकने में जितना वक्त लगता है, उसके दसवें हिस्से के बराबर समय में वे आपस में बात करती हैं. तंत्रिकाओं की आपसी बातचीत या संप्रेषण से किसी व्यक्ति के मस्तिष्क के स्वभाव का पता चलता हैः हम कविता क्यों लिखते हैं, गणित के जटिल सवाल क्यों हल करते हैं. डॉ. चटर्जी कहते हैं, ‘‘समझिए कि ऑटिज्म में वायरिंग की गड़बड़ी हो जाती है.’’
दिल्ली में 6 साल के जुड़वां भाई निक्की और कुश आम तौर पर किसी को परेशान नहीं करते. वे थॉमस ट्रेन (एक कार्टून ट्रेन का नाम) के साथ खेलते हुए गाते रहते हैं, ‘‘चुग्गा-चुग्गा, चुग-चुग.’’ लेकिन जब उन्हें अजनबियों से मिलने पर मजबूर किया जाता है तो वे बेकाबू हो जाते हैं.
वे सजे-संवरे ड्रॉइंगरूम को उलट-पलट कर देते हैं, चीजें तोड़ते हैं, सोफे की गद्दियां फाड़ देते हैं, किताबें और कलम कतार में रखते हैं और अगर कोई बात करने की कोशिश करे तो उस पर निशाना लगाते हैं. लोग उन्हें ‘खतरनाक जुड़ुआ’ कहते हैं और कोई उन्हें अपने घर नहीं बुलाना चाहता, लेकिन यह कोई नहीं जानता कि दिमाग के भीतर लगातार मच रही कानफाड़ू चक-चक के कारण इन जुड़वां भाइयों का ध्यान भटकता है.
नया विज्ञान बताता है कि ऑटिज्म में मस्तिष्क की कोशिकाएं बहुत शोर मचाती हैं. दिमाग की कोशिकाओं के बीच की सूक्ष्म कंदराओं में सामान्य से ज्यादा विद्युतीय ऊर्जा, ज्यादा रसायन और ज्यादा हार्मोंस होते हैं. इनके कारण सर्किट गड्डमड्ड हो जाता है. ऑटिज्म के कुछ रूपों में दिमाग में चक-चक होती रहती है तो कुछ में इसके विपरीत क्रिया होती है.
चटर्जी बताते हैं कि दोनों ही मामलों में मस्तिष्क के लिए संकेतों को पहचानना और उनका अनुसरण करना कठिन हो जाता है. इससे पता चलता है कि ऑटिज्म असाधारण क्षमताओं और अक्षमताओं का इतना चमत्कृत कर देने वाला स्पेक्ट्रम क्यों है.
इसका शिकार कोई व्यक्ति पूरे वाक्य नहीं बोल सकता तो कोई बिना कभी सीखे पियानो पर लंबी-लंबी रचनाएं बजा सकता है. किसी को बाएं और दाएं का फर्क नहीं मालूम होता, फिर भी वह पेचीदा गुणा-भाग कैलकुलेटर से पहले बता सकता है. चटर्जी कहते हैं, ‘‘मस्तिष्क का विकास तो ठीकठाक होता है, लेकिन यह अलग ढंग से विकसित होता है.’’
22 वर्षीय ऑटिस्टिक टीटो राजर्षि मुखोपाध्याय आजकल अमेरिका में रहते हैं. उन्होंने 2011 में अपनी पुस्तक हाउ कैन आइ टॉक इफ माइ लिप्स डोंट मूव? इनसाइड माइ ऑटिस्टिक माइंड में अपने मस्तिष्क में चल रहे ‘स्पंदन संघर्ष’ का जिक्र किया है. यह एक ऐसा युद्ध क्षेत्र है, जहां एक इंद्रिय दूसरी का एहसास देती है (दृष्टि रंग बन जाती है या ध्वनि गंध हो जाती है), अवचेतन की चीखें हावी हो जाती हैं.
गड्डमड्ड ध्वनियों या चेहरे के हाव-भाव से अवसाद के दौरे पडऩे लगते हैं. कभी भी कुछ बोले बिना उन्होंने आठ वर्ष की उम्र में लिखना शुरू कर दिया था. आज भी वे इसी ढंग से बातचीत करते हैं.
अब ऑटिज्म का प्रमुख कारण जेनेटिक यानी आनुवंशिक माना जा रहा हैः फ्रैजाइल एक्स सिंड्रोम (एफएक्सएस). इसकी जड़ में एक अकेली जीन एफएमआर1 है, जो ऐसा प्रोटीन पैदा करती है जो मस्तिष्क कोशिकाओं के आपस में बात करने के लिए जरूरी है. वैसे तो हर किसी के सेक्स क्रोमोजोम एक्स पर एफएमआर1 होती है, लेकिन कुछ लोगों में इस जीन में असामान्य परिवर्तन हो जाते हैं और यह माइक्रोस्कोप में टूटी हुई, सिकुड़ी हुई या कमजोर दिखने लगती है.
फ्रैजाइल एक्स की हरकत का मतलब है कि सर्किट काम नहीं करेगा. इस आनुवंशिक बदलाव के कारण ऑटिस्टिक मस्तिष्क जन्म से ही भिन्न होता है. फ्रैजाइल एक्स क्रोमोजोम अकसर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाते हैं और इनका कोई संकेत या लक्षण नहीं होता. ऑटिज्म का पुरुषों पर अधिक असर होता हैः लड़कों में 4,000 में एक तो लड़कियों में 6,000 में एक. ऑटिज्म के शिकार 20 प्रतिशत तक लड़कों में इसका कारण फ्रैजाइल एक्स है.
एनजीओ उम्मीद की संस्थापक कृष्णमूर्ति का कहना है कि एफएक्सएस और ऑटिज्म की समस्याओं के समाधान का एक तरीका मस्तिष्क को ऐसे नए तंत्रिका मार्ग तैयार करने में मदद देना है जो फालतू शोर को दबा दें. आठ साल के जीयन का मस्तिष्क यही करना सीख रहा है.
इस काम में उसका सबसे अच्छा दोस्त, एक साल का प्रशिक्षित लैब्राडोर कुत्ता सिंबा उसका मददगार है. बहुत ऑटिस्टिक बच्चों की तरह जीयन भी वाक्य की बजाए सिर्फ एक या दो शब्द बोला करता था. लेकिन अब सिंबा की मदद से वह पूरे वाक्य बोलना सीख गया है.
जब जीयन बॉल खेलना चाहता है तो सिंबा को सिखाया गया है कि उसके पूरा वाक्य बोले बिना टस से मस न हो. जीयन को कहना पड़ता है, ‘‘आओ बॉल खेलें.’’ इस नए सबक से उसके मस्तिष्क का सर्किट मजबूत हो रहा है, संवाद के नए रास्ते खुल रहे हैं और ऑटिज्म में सबसे बड़ी समस्या का समाधान हो रहा है.
पांच वर्ष के अथर्व में छह महीने पहले एफएक्सएस की पहचान की गई. जब वे बहुत छोटा था तब भी उसके माता-पिता गौरी और शेखर मुडे ने देखा था कि उसकी टांगों, शरीर और गर्दन की मांसपेशियों में कसावट कम थी. उसे घुटने के बल चलने में, चीजों की तरफ इशारा करने और पकडऩे में कठिनाई होती थी. उसके पिता बताते हैं कि उसके कान थोड़े बड़े थे, ‘‘हम उसे प्यार से गणपति बप्पा कहा करते थे.
हमें नहीं मालूम था कि यह एफएक्सएस का संकेत था.’’ पिछले साल खून की जांच से इसकी पुष्टि हुई. लेकिन कई तरह के उपचार की मदद से वह ऐसे बहुत से काम करने लगा है जो पहले नहीं कर पाता थाः अगर उसे कोई चीज चाहिए तो वह उसकी तरफ अंगुली तान सकता है, पेन पकड़ सकता है और टॉयलेट का इस्तेमाल कर सकता है.
शालिनी केडिया ने 2002 में मुंबई में फ्रैजाइल एक्स सोसाइटी ऑफ इंडिया नाम से रिसोर्स सेंटर खोला था. उनका कहना है कि ऑटिज्म का उपचार शुरू करने के लिए एक से दो साल की उम्र सबसे सही होती है. वे कहती हैं, ‘‘80 से 90 प्रतिशत तक मस्तिष्क का विकास जीवन के पहले ढाई वर्ष में होता है, इलाज तभी ज्यादा कारगर होता है.’’
शालिनी के क्लीनिक में मां-बाप तीन साल से भी छोटे बच्चों को लाने लगे हैं. उनका कहना है, ‘‘शिशुओं में ऑटिज्म को पहचानना टेढ़ा काम है. आम तौर पर 18 महीने की उम्र तक इसकी पहचान नहीं हो पाती, जब बार-बार चिंताजनक व्यवहार साफ जाहिर होने लगता है.’’ फिर भी कुछ-न-कुछ संकेत तो हमेशा मिलते रहते हैः शब्दों या इशारों की कमी. शालिनी के अनुसार, ‘‘पहचान जितनी जल्दी हो जाए, बच्चे की मदद उतनी जल्दी की जा सकती है.’’
ऑटिज्म को ठीक करना चिकित्सा जगत की बड़ी चुनौती है. इस सिंड्रोम के लिए उपलब्ध दवाएं सिर्फ डिप्रेशन और आक्रामक व्यवहार जैसे लक्षणों का इलाज करती हैं. लेकिन एमआइटी के तंत्रिका विज्ञानी मार्क बीयर ने मस्तिष्क की गतिविधि को धीमा करके सामान्य स्तर तक लाने के लिए रिसेप्टर लगाने का जो नया उपचार विकसित किया है, उसने अभी इंसानी परीक्षणों के दौर में प्रवेश किया है.
अगर इसके परिणाम भी चूहों पर हुए परीक्षणों के समान सही रहे तो यह ऑटिज्म के अन्य कारणों के उपचार की दिशा में पहला कदम हो सकता है. एनसीबीएस ने भी एफएक्सएस और ऑटिज्म के बारे में अपने सामूहिक अनुसंधान की ओर दुनिया का ध्यान आकर्षित किया है.
क्या कोई चमत्कार हो सकता है? गतिविधियां बढ़ रही हैं विभिन्न क्षेत्रों के वैज्ञानिक एकजुट हो रहे हैः जेनेटिसिस्ट, मॉलीक्यूलर बायोलॉजिस्ट और बायोकेमिस्ट मिलकर यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि मस्तिष्क कोशिकाएं कैसे बात करती हैं, इलेक्ट्रिकल फिजियोलॉजिस्ट उस संवाद की भाषा समझ रहे हैं और न्यूरोसाइंटिस्ट ढांचागत परिवर्तनों को पहचान रहे हैं.
बिहेवियरल न्यूरोसाइंटिस्ट और मनोचिकित्सक व्यवहार में बदलावों तथा कंप्यूटर विज्ञान जैविक आंकड़ों का अर्थ निकालने और स्टेमसेल विशेषज्ञ कोशिकाओं को नए सिरे से व्यवस्थित करने के लिए एकजुट हो रहे हैं.
अब सवाल यह है कि जब भारत में ऑटिज्म के शिकार पहले से ज्यादा बच्चे सामने आ रहे हैं तो क्या अतिउन्नत विज्ञान और माता-पिता का जोश नीति बनाने वालों को इस बहुत कम समझी गई सच्चाई के हित में काम करने के लिए बाध्य कर सकेंगे?
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