‘ऑटिज्म’ एक ‘जेनेटिक मेंटल डिसॉर्डर’ है. दुनियाभर में एक हजार में से दो बच्चे पैदाइशी ‘ऑटिस्टिक’ होते हैं. लेकिन, अगर किसी का पहला बच्चा ऑटिज्म का शिकार हो तो दूसरे बच्चे को यह बीमारी होने की संभावना पचास गुना ज्यादा होती है.
इसके शिकार बच्चों के लिए अब उम्मीद की नई किरण है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रही खोजों से पता चला है कि ‘ऑटिज्म’ के शिकार बच्चों को पेट संबंधी बीमारियां होती हैं. साथ ही उनके शरीर में पारे जैसा ‘हेवी मेटल’ सामान्य बच्चों की तुलना में ज्यादा होता है. अगर पेट संबंधी बीमारियां ठीक करने के बाद शरीर में मौजूद अधिक पारा निकाल कर बच्चे को हाइपर बेरिक ऑक्सीजन थेरेपी दी जाए, तो बच्चा काफी हद तक ठीक हो सकता है. एशिया में पहली बार दिल्ली स्थित इंस्टीट्यूट फॉर न्यूरो डेवलपमेंटल डिसेबिलिटीज इंटरवेंशनल रिसर्च ए€िटविटीज (इंदिरा) अपनी सहयोगी संस्थाओं के साथ इस थेरेपी का ट्रायल करने जा रहा है. यह जानकारी इंदिरा प्रोजे€ट के डायर€टर और भारत में एचबीओटी थेरेपी के पितामह डॉ.अरूण मुखर्जी ने प्रेस कांफेंस में दी. उन्होंने बताया कि भूजल में प्रदूषण, वै€सीनों में इस्तेमाल किया जाने वाले एक ‘प्रिजवेर्टिव’ और मां को ‘डेंटल इमलगम’ आदि समस्याओं के कारण बच्चों के शरीर में ‘हेवी मेटल्स’ की मात्रा बढ़ जाती है.
ऑटिस्टिक बच्चों में इन खनिज पदाथोर्ं को निकालने का सिस्टम विकसित नहीं होता और ये उनके टिश्यू में जगह बना लेते हैं. ये शरीर के लाभदायक ऍंजाइम को रिप्लेस करते हैं, जिसके बाद प्रतिरोधक तंत्र की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप इनके पेट में तमाम तरह के इन्फे€शंस हो जाते हैं. 95 फीसदी ऑटिस्टिक बच्चों का पेट खराब रहता है. अगर सिर्फ इनका पेट ठीक हो जाए तो समस्या काफी हद तक नियंत्रण में आ सकती है.अमेरिका की नॉर्थ कैरोलिना यूनिवर्सिटी के डॉ.रशीद बुटर को एक खोजपत्र मिला, जिसमें कहा गया था कि ऑटिस्टिक बच्चों के बालों के सैंपल लिए जाऍं तो उनमें पारे की मात्रा सामान्य से कम मिलेगी.यानि उनका शरीर पारे जैसे खतरनाक खनिज निकाल नहीं पा रहा है. पहले तो उन्होंने इसको सिरे से खारिज कर दिया.
बदकिस्मती से उनके बेटे को यही बीमारी हुई तो उन्होंने इस पर खोज की और 70 फीसदी बच्चे ठीक होने लगे. अमेरिकी अदालत में इसे चुनौती दी गई और वहां के इतिहास में पहली बार सबसे कम उम्र के गवाह के रूप में उनके बेटे को बुलाया गया और थेरेपी सही पाई गई. उसके बाद से वैज्ञानिकों ने इस पर खोज कार्य तेज किए. डॉ.मुखर्जी ने बताया कि यह ट्रायल जुलाइ 2006 से शुरू होंगे और इनके नतीजे 2007 के अंत तक आने की उम्मीद है. उसके बाद अंतरराष्ट्रीय प्लेटफार्म पर ये नतीजे और दुनिया भर के बाकी वैज्ञानिकों के नतीजे रखे जाऍंगे. हालांकि इसे अप्रूवल मिलने में करीब 15 साल लग सकते हैं. इस थेरेपी में पहले चार महीने बच्चे की पेट संबंधी बीमारियों का इलाज किया जाएगा, फिर एक साल पारा निकालने के कैप्सूल दिए जाऍंगे. फिलहाल साल भर के कैप्सूल की लागत 1.25 लाख आ रही है, जिसे चौथाई दामों पर हासिल करने के प्रयास किए जा रहे हैं.
उसके बाद बच्चे को एचबीओटी थेरेपी देंगे, जिसमें एक चेंबर में बिठाकर ऑ€सीजन का दबाव बढ़ा दिया जाता है. इससे र€त में मौजूद पानी की मात्रा ज्यादा हो जाती है और दिमाग की सही कोशिकाओं से निकल कर वह पानी और उसमें मौजूद ऑ€सीजन मृत कोशिकाओं तक पहुंच कर उन्हें जीवित करती है. यह थेरेपी तीन साल तक के बच्चों को देने पर ही अच्छे नतीजे निकलने की उम्मीद है. €यूबा की सरकार इसे मान्यता दे चुकी है. डॉ.मुखर्जी सेरिब्रल पाल्सी के शिकार बच्चों में एचबीओटी थेरेपी पर ट्रायल कर रहे हैं और उसके अच्छे नतीजे निकले हैं. सेमिनार के दौरान उन्होंने सेरिब्रल पाल्सी और ऑटिज्म के मरीज बच्चों के अभिभावकों को जानकारी दी.
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