Thursday, 24 September 2015

सही सुनना ‘ऑटिज्म ’ के शिकार बच्चों के लिए जरूरी

हमारे समाज में ऐसे बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जिनके दिमाग का विकास अधूरा रह जाता है या नुक्सदार होता है। जरूरत से ज्यादा डरपोक होना या जरूरत मुताबिक भी न डरना, हुड़दंगी होना, जरूरत से ज्यादा बोलना या बहुत कम बोलना,असामाजिक स्तर तक शरारती होना, छोटी-छोटी बात पर शोर मचाना, ढीठ होना या शक्ल व देखने के नुक्स होना आदि ऑटिज्म होने के लक्षण हैं।

दिमाग के विकास के लिए सुनने की प्रक्रिया का सही ढंग से काम करना बेहद जरूरी है, सुनने का काम कान करते हैं। इनके तीन हिस्से होते हैं-बाहरी कान, बीच वाला कान व अंदरूनी कान। बाहरी कान जो हमें बाहर से नजर आता है। यह आवाजें पकड़ता है। बीच वाला कान आवाजों को अंदर पहुंचाता है और अंदरूनी कान ध्वनि ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदल देता है, जिसे दिमागी नाड़ी दिमाग तक ले जाती है,जहां उसका अध्ययन होता है।

सुनने की प्रक्रिया के विकास में किसी भी स्तर पर अगर नुक्स रह जाए तो दिमाग के विकास में अधूरापन आ जाता है। ऑटिज्म से पीड़ित बच्चों में ज्यादातर गहरा कारण सुनने की प्रक्रिया का नुक्सदार होना माना जाता है। इस की एक शक्ल गूंगे-बहरे बच्चे हैं। बच्चा जन्मजात से ही सुनने की प्रक्रिया से वंचित रह जाता है। जो बच्चा सुन नहीं सका, वह बोल भी नहीं सकेगा क्योंकि बोलना सीखना सुनने की प्रक्रिया से ही विकसित होता है।

शब्दों को ठीक से न सुनने के कारण या अभिभावकों व अध्यापकों की ओर से समस्याओं को समझे बिना बच्चों को दोषी ठहरा दिए जाने के कारण संबंधित बच्चों का व्यवहार चिड़चिड़ा होना, बदतमीज होना और उसके व्यक्तित्व में अनेकों विकृतियां आ जाती हैं। इनको सांझा नाम भी दिया गया है ‘आडिटरी प्रोसैसिंग डिसआर्डर’ यानी सुनने की प्रक्रिया की विकृति। अभिभावकों व अध्यापकों द्वारा किए गाली-गलौच व मारपीट के कारण ये बच्चे उनसे नफरत करने लगते हैं। इस व्यवहार को मनोवैज्ञानिक रोग कह कर इन बच्चों का मनोवैज्ञानिक इलाज करवाने की कोशिश की जाती है। असल में यह मनोवैज्ञानिक रोग नहीं, बल्कि सुनने की प्रक्रिया का नुक्स है। 

इसेे समझने के लिए आवाज को समझना जरूरी है। आवाज हमारे कानों तक तरंगों के रूप में पहुंचती है। इन तरंगों के दो गुण होते हैं। एक तो तीव्रता यानी आवाज कितनी ऊंची है? आवाज तरंगों को डैसीबल में मापा जाता है। दस डैसीबल से कम वाली आवाज हमें सुनती ही नहीं। इसके बाद 10 से 100 डैसीबल तक की आवाजों को हम आम जिंदगी में इस्तेमाल करते हैं। उससे ऊंची आवाजेें हमारे कानों के पर्दे को नष्ट कर सकती हैं।

यह देखने में आया है कि जब अध्यापक पूरी कक्षा को पढ़ाता है तो वह बच्चों पर ध्यान नहीं देता। अगर बच्चे को कोई बात अकेले में समझाई जाती है तो वह समझ जाता है। इसी तरह जो काम बिना आवाजें सुने किए जा सकते हैं उन्हें बच्चा सही ढंग से करता है जैसे खेलना, कूदना, उछलना आदि। मनोवैज्ञानिक को यह व्यवहार समझ नहीं आता और वह दुविधा में पड़ जाता है कि बच्चों को ठीक सुनता नहीं या उसको मनोवैज्ञानिक समस्या है। 

इस समस्या का सही कारण समझ आने के उपरांत साल 1950 में डाक्टर ब्राड ने इसका इलाज करने के लिए एक क्रांतिकारी ढंग खोजा, जिसे ऑडिटरी इंटीग्रेशन थैरेपी कहा जाता है। एक खास किस्म की मशीन इजाद की गई, जिस द्वारा बच्चों को अलग-अलग फ्रीक्वैंसी व अलग-अलग तीव्रता वाला संगीत सुनाया जाता है। आहिस्ता-आहिस्ता इन आवाजों से बच्चों के दिमाग के अविकसित सैल विकसित हो जाते हैं और दिमागी सैलों का आपसी तालमेल सही ढंग से बनने लगता है।

इस संगीत को इस ढंग से विकसित किया गया है कि बच्चा उससे ध्यान नहीं हटा सकता। जिस कारण दिन-ब-दिन उसके व्यक्तित्व में आई विकृतियां ठीक होने लगती हैं। वह अपनी कक्षा में ठीक पढऩे लगता है। वह हुड़दंगपन छोडऩे लगता है। उसका व्यवहार असामाजिक से सामाजिक व सब को अच्छा लगने वाला बनने लगता है।

वह जिन शब्दों का गलत उच्चारण करता था, अब उनका उच्चारण ठीक करने लगता है। आहिस्ता-आहिस्ता बच्चा आत्मनिर्भर व आम बच्चों जैसा बन जाता है। यह ऑडिटरी इंटीग्रेशन थैरेपी अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त डा.कैरिन स्मिथ ने बाबा फरीद सैंटर फार स्पैशल चिल्ड्रन्स फरीदकोट को तोहफे के तौर पर दी है जहां ‘ऑटिज्म ’ वाले बच्चों में यह सफलतापूर्वक इस्तेमाल की जा रही है। 
—डा. अमर सिंह आजाद

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