पूरे विश्व में हर वर्ष दो अप्रैल को ऑटिज्म (स्वलीनता) के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए “विश्व ऑटिज्म (स्वलीनता) जागरूकता दिवस” मनाया जाता है।
इसका शीर्षक वर्ष 2015 में "रोजगार : ऑटिज्म के लाभ" हैं। संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के एक अनुमान के अनुसार है, ऑटिज्म से पीड़ित अस्सी प्रतिशत से ज़्यादा व्यक्ति बेरोजगार हैं। वर्ष 2015 में विश्व ऑटिज्म (स्वलीनता) जागरूकता दिवस का शीर्षक “ऑटिज्म से पीड़ित व्यक्तियों के जीवन में सुधार लाना तथा उन्हें सार्थक जीवन जीने के लिए सक्षम बनाने पर ज़ोर देना” हैं।
ऑटिज्म विकास संबंधी विकलांगताजन्य रोग है। इस रोग के लक्षण तीन साल की उम्र से पहले अथवा तीन साल की उम्र तक दिखाई देते हैं तथा यह जीवनपर्यंत बने रहते हैं। इससे मस्तिष्क के कार्यों/प्रक्रिया पर गहरा प्रभाव पड़ता हैं। ऑटिज्म से पीड़ित बच्चों में दूसरों से बातचीत न करने अथवा बाहरी दुनिया से अनजान अपनी ही दुनिया में खोए रहने की समस्या पाई जाती हैं। उनका व्यवहार भी असमान्य (अन्य बच्चों से काफ़ी अलग) होता हैं। ये बच्चे आसानी से नाराज़ हो जाते हैं तथा इन्हें स्कूल में सीखने-समझने में कठिनाई का सामना करना पड़ता हैं। लेकिन यह अच्छी बात हैं कि ऑटिज्म से पीड़ित व्यक्ति बहुत बारीकी से हर जानकारी पर ध्यान देते हैं तथा ऐसे बच्चे कुछ गतिविधियों में दूसरों की तुलना में बेहतर होते हैं।
ऑटिज्म होने का मुख्य कारण क्या हैं? इसका अभी तक पता नहीं चल पाया है, लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार यह आनुवंशिक या पर्यावरणीय कारकों के कारण होने वाली बीमारी है। इस रोग का कोई उपचार नहीं है। हालांकि, इस रोग को दवाओं और विशेष शिक्षकों की मदद से प्रबंधित किया जा सकता है। ऑटिज्म से पीड़ित व्यक्तियों को उनकी विशिष्ट ज़रूरतों के आधार पर बिहेवियर, स्पीच, ऑक्युपेशनल अथवा एजुकेशनल थेरेपी की आवश्यकता होती हैं। यदि इस रोग से पीड़ित व्यक्तियों को विशेष देखभाल की सुविधा प्रदान की जाएँ, तो समय के साथ उनके लक्षणों में सुधार हो सकता हैं।
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