(डॉ। अंजलि जोशी)गुरूवार, 31 अगस्त 2006
कुदरत भी कभी-कभी बेवजह ही कहर ढाती है और बेकसूर को भी सजा दे डालती है। बच्चे का असामान्य होना माता-पिता के लिए ऐसी ही सजा होती है। क्योंकि अपने असामान्य बालक को देखकर जहॉँ उनकी ममता रोती है वहीं उसका लालन-पालन भी एक ब़डा संघर्ष होता है।इसी प्रकार की एक असामान्यता है ऑटिज्म। ऑटिज्म से पीडित बच्चे का संवेदी तंत्र अव्यविस्थत होता है। नतीजतन वह अपनी खुद की जिदगी, रिश्तों और सामान्य गतिविधियों तक से तालमेल नहीं बैठा सकता। ऐसे बच्चों और उनके माता-पिता की मदद के लिए चिकित्सा जगत ने कई विधियाँ विकसित की हैं, ताकि ऑटिज्म से पीडित व्यिक्त अधिक से अधिक सामान्य जीवन जी सके। ऐसे ही कुछ उपायों की चर्चा यहॉँ की जा रही है—
इंसान अपनी संवेदनाओं के माध्यम से ही आसपास की दुनिया की खोजबीन करता है, उसके बारे में सीखता है। इन संवेदनाओं में स्पर्श, गति, शरीर के प्रति सचेतता, दृष्टि, ध्वनि और गुरूत्वाकर्षण का खिचाव शामिल है। दिमाग में इन संवेदनाओं को व्यविस्थत करके ही संपूर्ण व्यिक्तत्व विकसित होता है।
अधिकांश बच्चों में उम्र बढ़ने के साथ सहज ढंग से संवेदनाऍ विकसित हो जाती हैं। कुछ बच्चों में यह प्रक्रिया तेज तो कुछ में धीमी हो सकती है। सहज सलीकेदार चाल-ढाल, हाव-भाव, भाषा, भावनात्मक परिपक्वता, सामाजिक अंतर्कि्रया और कुशलताओं का विकास ऐसे ही होता है।
मगर ऑटिज्म से पीडित बच्चे में संवेदी तंत्र अल्प सक्रिय या अतिसक्रिय प्रतिक्रिया दे सकता है। जैसे यदि स्पर्श संवेदना का ही उदाहरण लें, तो संभव है कि मुलायम ऊन किसी अति सक्रिय संवेदी तंत्र वाले बच्चे को कॉँटों की चादर-सा महसूस हो। दूसरी ओर यह भी संभव है कि अल्प सक्रिय संवेदी तंत्र वाला बच्चा काफी ऊँचाई से गिरे, मगर उसे कोई दर्द महसूस न हो!
उपरोक्त संवेदनाओं को हम तकनीकी रूप से स्पर्श, संतुलन व गति, प्रोप्रियोरिसेप्शन (शरीर के जो़डों से प्राप्त सूचनाऍ), श्रवण, दृष्टि और गुरूत्व संवेदना कहते हैं। ये विभिन्न संवेदी तंत्र हमारे दिमाग को सूचनाऍँ भेजते हैं। दिमाग इन सूचनाओं का प्रोसेसिग करता है और शरीर के विभिन्न अंगों को क्रिया करने के आदेश भेजता है। ये आदेश कोई कार्य करवाने या मात्र सीखने के लिए हो सकते हैं। यानी ऑटिज्म से पीडित बच्चे में संवेदनाओं का यह तंत्र ठीक से काम नहीं करता फलस्वरूप वह जिदगी, रिश्तों और सामान्य गतिविधियों से तालमेल नहीं बैठा सकता।
संवेदी तंत्र यह तंत्र गर्भधारण के तुरंत बाद विकसित होने लगता है और शिशु के जन्म से पहले ही काफी सक्रिय हो जाता है। ऑटिज्म से पीडित बच्चे का स्पर्श संवेदी तंत्र अल्प सक्रिय हो सकता है। ऐसा बच्चा ऊपर से गिरने के बाद भी दर्द महसूस नहीं करता। ऑटिज्म से पीडित कुछ बच्चों की स्पर्श संवेदना अतिसक्रिय होती है- ऐसे बच्चे को बाल या नाखून कटवाने या स्पर्श से संबंधित अन्य गतिविधियों तक में काफी परेशानी होती है।
क्या कर सकते हैं?
* ऐसे बच्चे के साथ छुपा-छुपी का खेल खेलें, जिनमें अनाज या दालों में कोई चीज छिपाकर उसे ढूँढ़ना हो। चीजें ऐसी हों जिन्हें बच्चा पहचानता हो। देखना यह है कि क्या वह उन चीजों को सिर्फ छूकर पहचान सकता है।
* अलग-अलग खुरदरेपन वाली चीजों से खेलते हुए बच्चे को उनके बीच अंतर करने में मदद करें।
* बच्चे को अलग-अलग कण गठन वाली चीजों (जैसे रेत, साबुन का झाग, गीले आटे, सूखे आटे या टेल्कम पॉवडर) में उँगली से चित्र बनाने दीजिए।
संतुलन व गति तंत्रसंतुलन तंत्र जन्म के कुछ सप्ताह बाद विकसित होता है और बच्चे के शुरूआती विकास में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
संतुलन तंत्र चलने-फिरने व अन्य गतियों में और सिर की स्थिति को सही रखने में मददगार होता है। ऑटिज्म से पीडित बच्चे में इस तंत्र में कई किस्म की समस्याऍँ हो सकती हैं—
* बारीक गतिविधियों में तालमेल की कमी या बेढंगापन।
* दृश्य सूचना को प्रोसेस करने में दिक्कत, जैसे बोर्ड पर लिखी बातों की नकल न कर पाना।
* शारीरिक गतिविधि करने में अनिच्छा। ऐसा बच्चा ज्यादातर समय सुस्ताना या प़डे रहना चाहता है।
* भाषा समझने और बोलने में दिक्कत।
* अनुपयुक्त भावनात्मक प्रतिक्रियाऍँ। जैसे अनियंत्रित ढंग से हँसना या रोना।
संतुलन तंत्र की असामान्य प्रतिक्रिया अल्प या अति दोनों तरह की हो सकती है। जैसे कोई बच्चा घंटों झूले पर झूलता रहे और उसे चक्कर महसूस न हो या अतिसक्रियता के मामले में बच्चा थो़डी-सी हरकत करने में भी हिचके।
क्या कर सकते हैं?ऐसे बच्चे के संतुलन तंत्र के विकास और सामान्य कामकाज में मदद के लिए निम्नलिखित चीजें आजमा सकते हैं—
* हिलने-डुलने, गति करने से संबंधित क्रियाकलाप बहुत महत्वपूर्ण हैं। झूला झूलने, फिसल पट्टी पर फिसलने सी-सॉ, वगैरह काफी मददगार होते हैं।
* बच्चे को स्वयं झूला झूलने को प्रेरित करें।
* कार-बस वगैरह में यात्रा बच्चे के लिए संतुलन संबंधी संवेदी सूचनाओं का अच्छा स्त्राोत हो सकती है, मगर इस दौरान कहानी सुनाना जैसी गतिविधि करने की जरूरत होती है ताकि बच्चा सहज, शांत रहे और इन संवेदी सूचनाओं को ग्रहण कर सके।
शरीर की स्थितिमांसपेशियाँ और हिड्डयों के जो़ड शरीर की स्थिति की जानकारी दिमाग को भेजते रहते हैं। इस संवेदी तंत्र की मदद से हम चाय का प्याला पक़डने, लिखने के लिए सही दबाव डालने या लोगों से एक सही दूरी बनाकर ख़डे होने जैसे बारीक क्रियाकलाप कर पाते हैं। ऑटिस्टिक बच्चे में इस तंत्र का तालमेल मुश्किल होता है।
क्या कर सकते हैं?
यह तंत्र खींचने-धकेलने की गतिविधियों से सक्रिय होता है। इसके लिए उछलना-कूदना, रस्साकशी, छोटे-मोटे वजन उठाना, कुर्सियों को जमाना जैसे क्रियाकलाप मददगार होते हैं। प्रोप्रियोरिसेप्टर तंत्र संतुलन तंत्र के साथ तालमेल से चलता है, इसलिए संतुलन तंत्र को सक्रिय करने वाले कार्य इस तंत्र के भी अच्छे अभ्यास होते हैं।
हम सभी अपने मुँह का उपयोग स्वयं को व्यविस्थत करने, शांत करने और सचेत करने हेतु करते हैं। संवेदनाओं के तालमेल की ग़डब़डी से पीडित बच्चों को अपने मुँह का उपयोग कई तरह से करने का अभ्यास जरूरी है। बच्चे के मुँह की क्रियाओं को बेहतर करने के लिए कुछ गतिविधियाँ की जा सकती हैं।
* ऐसी गतिविधियाँ जिनमें फूँकना होता है, उनसे साँस पर काबू पाने में मदद मिलती है। जैसे फुग्गा फुलाना, साबुन के बुलबुले बनाना, सीटी बजाना वगैरह। साँस पर काबू पाना बोलने के संदर्भ में बहुत मत्वपूर्ण है।
* बच्चे को ऐसी चीजें खाने को दें, जिन्हें चूसने में या चाटने में उसे मजा आए।
* पानी या दूध पीने के लिए बच्चे को स्ट्रॉ का इस्तेमाल करने दीजिए।
* स्टिकर बुक ले आइए। बच्चे से कहिए कि वह अपनी जीभ निकालकर थूक से स्टिकर लगाए।
दिन की शुरूआतऑटिज्म से पीडित कुछ बच्चे ऐसे होते हैं जो कोई भी काम करने के हिसाब से हिलते-डुलते नहीं, जबकि आसपास सब लोग सक्रिय हैं। इन बच्चों के लिए दिन की शुरूआत में कुछ जगाने वाली गतिविधियाँ उपयोग होती हैं।
* सुबह टहलना या कुछ कसरत।
* दरवाजे की चौखट पर लटकना, झूलना वगैरह।
* गेंद फेंक कर दीवार पर मारना।
* ब़डे-ब़डे तकिए, गद्दे उठाना, फर्नीचर सरकाना।
अति-सक्रियताऑटिज्म से पीडित बच्चे,आसानी से एडजस्ट नहीं हो पाते। इसलिए उन्हें किसी उद्दीपन (संवेदी संकेत) का आदी बनाने का प्रयास न करें। खासतौर से ऐसे उद्दीपनों के संदर्भ में तो ऐसा बिलकुल न करें जिन्हें आसानी से हटाया जा सकता है।
सामाजिक रूप से स्वीकार्य शांतिदायक गतिविधियों की मदद लीजिए। जैसे हल्का संगीत, झूला/ गोद में लेकर थपथपाना, टायर-ट्यूब पर कूदना, सिर की मालिश, सिर पर पट्टी बाँधना वगैरह।
खुद को नुकसानऐसा व्यवहार बच्चे के पालकों और पेशेवर चिकित्सकों के लिए बहुत तकलीफदायक होता है, खासकर जब ऐसा उनकी मौजूदगी में हो। ऐसे मौके पर धैर्य और तर्क का दामन न छो़डें। ऐसा व्यवहार अक्सर तनाव के कारण होता है। कुछ सुझाव निम्नानुसार हैं—
* उसी उद्दीपन के लिए कोई अच्छा विकल्प दे दीजिए- जैसे यदि बच्चा अपनी उँगली/ नाखून चबाता है तो उसे प्लास्टिक की चाबी या रबर ट्यूब दे दें।
* यदि बच्चा सिर पटक रहा है तो उसके सिर पर मालिश करें (अच्छे से दबाकर) या सिर पर पट्टी बाँधना एक विकल्प हो सकता है। बच्चे को यह सिखाने की कोशिश करें कि सिर पटकने की बजाए सिर दबाना बेहतर है।
* यदि बच्चा आपका ध्यान खींचने के लिए खुद को नुकसान पहुँचा रहा है तो उसे इंतजार करना सिखाइए। बच्चे को कमर पर दृढ़तापूर्वक पक़डना इसमें मददगार होता है। कमर से पक़डकर नीचे की ओर दबाव डालिए ताकि वह जमीन पर बैठ जाए। फिर नीचे झुककर उसकी ऑँखों में ऑँखे डालकर साफ-साफ निर्देश दीजिए। बच्चों को निर्देश देने में यह तकनीक कारगर होती है।
जो कुछ हम देखते हैं उससे दिमाग जो अर्थ निकालता है उसे दृष्टि एहसास कहते हैं। शैक्षिक हुनर के विकास के लिए दृष्टि एहसास जरूरी है। इसके लिए घर पर कई गतिविधियाँ की जा सकती हैं—
* जिग-सॉ पहेलियाँ
* लक़डी/प्लास्टिक के गुटके जिन पर चित्र बने होते हैं।
* ज्यामितीय आकार की डिजाइनें।
* मोती की मालाऍँ बनाना जिनमें कोई पेटर्न हो।
यहॉँ मैंने कोशिश की है कि ऑटिज्म से पीडित बच्चों के व्यवहार और समस्याओं को एक वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में रख सकूँ। संवेदना तालमेल चिकित्सा वास्तव में कोई प्रशिक्षित पेशेवर ही कर सकता है। बहरहाल माता-पिता और परिवार के तौर-तरीकों में थो़डा फेरबदल शायद इन बच्चों के लिए बहुत मददगार साबित होगा।
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